एक रात मैंने आसमान में तारे देखे कई ..उनमें से एक पे नाजाने क्यूँ .. नज़र ठहर गयी।
सब जैसा ही .. फिर भी अलग ..
टिमटिमाहट .. उसकी अनघ।
जैसे मुद्दतों से मुझे उसी का इंतज़ार था ..
हर रोज़ देखने का .. इक जुनून सा सवार था।
पता भी ना चला और आदत बन गया वो ..
मेरी प्राथना का हिस्सा .. मेरी इबादत बन गया वो।
कई रातें बितायी उसकी रौशनी के नीचे ..
पड़ा रहता था रात भर यूँही .. आँखें मीचे।
पाने की चाह में कूद गया एक दिन ..
सोचा मुठी में बंद करके .. नीचे ले आऊंगा।
भूल गया था उड़ान सीमित है मेरी
और आसमा कभी किसी के लिए झुकता नहीं ..
मुह के बल गिरा।

